चालीसवां साल

Nandini/ July 3, 2020/ Social Issues, कविता/Poetry/ 0 comments

कल ही कि तो बात लगती है,
जब मैं बाबा के आंगन में खेला करती थी,
जब माँ के हाथ से हर ग्रास का,
सुख चखा करती थी,
जब पहली बार स्कूल गई थी,
पहली सहेली बनी थी,
पहला वो टिफिन का डब्बा,
पहला वो नया नया बस्ता,
पहली कट्टी,पहली बट्टी,पहली डांट,पहला पाठ
सब लगता है जैसे कल ही की बात थी

पहली बार पापा के साथ बाज़ार जाना,
अपनी पसंद की वो मिठाई लाना,
पहली बार बड़ी बहन बनना,
और फिर उसका रौब दिखाना,
वो पहली बार रसोई बनाना,
और सबसे तारीफ पाना,
वो पहला पीरियड,
और फिर उसके डर से घबराहट
ऐसा लगता है, जैसे कल ही की बात थी

पहली बार गाड़ी चलाना,
और सम्भल ना पाने पर खुद ही गिर जाना
कॉलेज का वो पहला दिन,
सपनों से भरे वो रात और दिन
पहली बार दिल का धकड़ना,
पहली बार उसका देखना
पहली बार यूँ नज़रें चुराना,
वो पहला शर्माना,
ऐसा लगता है,जैसे कल ही की बात थी

पहली बार ज़िम्मेदारी उठाना,
बेटी से बहु और फिर बहु से बेटी का सफर तय करना,
ससुराल में पहली रसोई की रस्म निभाना,
नए घर को अपना बनाना
पहली बार माँ बनना,
पहली बार उसकी उंगली पकड़ना,
पहला ग्रास उसे खिलाना,
पहली बार माँ होने का अर्थ समझना
ऐसा लगता है, जैसे कल ही की बात थी

चालीस सालों का ये सफर, आज भी नया सा लगता है,
जी लिया जो हज़ारों बार, पर अब भी खिला से रहता है,

~ नन्दिनी

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