आज़ादी

Nandini/ June 18, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

अक्सर यूँ होता है कि हम कहना कुछ चाहते हैं, लेकिन कह कुछ और जाते हैं। अक्सर हम समझ ही नहीं पाते कि जो हम बोल रहे हैं उसके मायने क्या हो सकते हैं, क्या सामने वाला वाकई आपकी बात को उस ढंग से ले पाएगा।कई बार बड़ी आसानी से हम अपनों को कह देते हैं कि जाना है तो जाओ, हर किसी का इसे कहने का अंदाज़ अलग होता है। कितने ही बार हमें ये एहसास दिलाया जाता है कि अगर हमें उनका साथ चाहिए तो उनके मुताबिक रहो, वरना हमारे जाने से उन्हें फर्क नहीं पड़ता, कई बार ये केवल नाराज़गी दिखाने का तरीका होता है, लेकिन क्या हो अगर किसी दिन आपका कोई प्रिय आपकी इस बात को मान ही जाए। बस इसी एक विचार पर आधारित है, मेरी ये कविता, आशा करती हूं कि आपको मेरी ये कविता पसंद आए।

आज़ादी, रिश्तों की उलझनों से, उनके टूट जाने के डर से।

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