हुनर

Nandini/ June 26, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

मुझमें ये हुनर है, कि मुझमें कोई हुनर नहीं
जीवन को जीने का जज़्बा तो है,
पर कैसे जीना है, ये पता नहीं

मैं गल्तियों को अपनी स्वीकारती हूँ,
तुम किसी काम की नहीं, ये बोले कोई,
उससे पहले ही ये सच जानती हूँ,
मैं जानती हूँ, कि कोई मेरी ओर
खींचा चला आए,
मेरे अंदर ऐसी कोई बात नहीं,

ना पाक कला में निपुण हूँ,
ना घर सजाते बनता है,
ना खुद का खयाल रख पाती हूँ,
ना सजना संवारना आता है,
फिटनेस में तो ज़ीरो हूँ,
रूप रंग को निखारूं,
सुहाती ऐसी कोई बात नहीं,

ना मुझे लोगों से मिलना जुलना आता है,
ना किसी को समझने की कला आती है,
ना मैं किसी का दुख जान पाती हूँ,
ना उसके दुख से मुझे पीड़ा होती है।

ऐसा नहीं है कि किसी की पीड़ा,
मुझे खुश कर जाती है,
लेकिन मैं जानती हूँ कि,
संवेदनाएं भी अक्सर चोटिल कर जातीं हैं।

बेटी, बहन, पत्नी, बहु और माँ
ऐसे हर रिश्ते को जिया है मैंने, लेकिन,
कभी त्याग की भावना नहीं आती है,

मैं जीती जाती हूँ जीवन को हर दिन,
जो मिलता है उसका शुक्रिया भी जताती हूँ,
फिर भी, अभी कुछ और बाकी है,
ये बात बड़ा सताती है,

मैं खुद को मजबूरियों के नीचे नहीं दबाती
जो बात मन में है, उसे औरों से नहीं छिपाती
कभी ग़र तुम्हें लगे, कि मैं सामने कुछ और
पीछे कुछ और हूँ,
पढ़ने में कुछ, और मिलने में कुछ और हूँ,
तो इसीलिए, क्योंकि मैं इतने जल्दी किसी
को भी अपना नहीं बनाती।

किसी को पल में अपना बना लेना,
किसी के पल में हो जाना,
ये बातें कुछ कागज़ी लगती हैं मुझे,
क्योंकि, जो यूँ ही हवा हो जाएं,
मैं वो रिश्ते नहीं निभाती ।

कुछ दोस्त हैं पुराने, जो जानते हैं मेरी कमज़ोरियों को
वो जानते हैं कि मैं चाहे जहाँ चली जाऊँ,
किसी के हिस्से में कोई खुशी भले ही ना दे पाऊँ,
लेकिन दिल से किसी के कभी नहीं जाती।

मैं उस पुरानी पड़ी किताब की तरह हूँ,
जिसे जब उठाओगे, दिल के करीब पाओगे,
सीलन की महक बसी होती है मगर,
मिट्टी की खुशबू नहीं जाती।

~ नन्दिनी

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