कल रात

Nandini/ July 7, 2020/ कविता/Poetry/ 5 comments

बहुत देर तक बिस्तर पर करवट बदलती रही,
वो रूह जो तेरे छूने से आराम पाती थी,
मैंने समझाया उसे, बैठाया अपने पास
पूछा भी कि क्या हुआ, क्यों है वो उदास।
ये ज़ुल्फ़ें बिखरी क्यों हैं, ये कमरे में अंधेरा क्यों है
क्यों तू पहले की तरह हंसती नहीं है,
क्यों अब चेहरे पर वो उम्मीद नहीं है।
आ चल के मैं तुझे बाहर का मंज़र दिखाऊँ
जीना किसे कहते हैं, तुझको सिखाऊँ।
ये सुनते ही आखों में सैलाब उतर आया,
दफ़्न था जो सीने में, वो दर्द बाहर आया
पगली कहने लगी, वो नहीं है पास
के जिसने जीना सिखाया था,
जिसने मेरी हंसी को अपना बनाया था,
वो, जिसके बिन कभी कटती नहीं थीं रातें,
वो, जिसके बिन, कभी होती नहीं थी सुबहें
वो, के जो मेरे अंदर ही कहीं बसा करता था,
वो, जो मेरे जज़्बात को आंखों में पढ़ा करता था।
मुझे जीने नहीं देती है खामोशी मेरे कमरे की,
ना मरने ही देगी ये बेबसी मेरे अपनों की,
क्या करूँ कि अब हर चेहरा मुझपर हंसता है,
जिधर देखती हूँ, सन्नाटा सा पसरा रहता है।
मैं कुछ कह ना सकी, बस ख़ामोश सुनती रही
वो खमोशी, जिसे छूकर तूने ज़िंदा किया था मुझे।

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5 Comments

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