मैं संभल गई

Nandini/ June 25, 2020/ कविता/Poetry/ 2 comments

सुनो, मत आओ यूँ मेरे पास,
अब मैं संभल चुकी हूँ
तुम्हारे हर एहसास, हर बात से
अब मैं संभल चुकी हूँ,
अंधेरों से उजाले का सफर तय कर चुकी हूँ
देखो, कि मैं संभल चुकी हूँ।
उन खोखले अल्फाजों का अब,
कोई असर ना मुझपर होगा,
भूलना तो कभी तुम्हें चाहा ही नहीं पर,
अब मेरी राह का हमसफ़र ना तू होगा,
तुम करोगे सवाल,
कि क्यों मैं बावली सी हुई जाती हूँ,
क्यों हर बात को इतना बढ़ाती हूँ,
तो सुनो, करो याद वो रात,
वो रात, जब घबरा कर अपना डर उठा कर,
मैं दौड़ कर तुम्हारे पास आई थी,
तुम चूम के माथा हर लोगे हर पीड़ा मेरी,
ये आस मैंने ही लगाई थी,
और वो याद है तुम्हें!
कैसे तुमने तसल्ली के दो बोल बोलकर,
बंद कर लिया था दरवाज़ा अपना,
फिर रात भर, खुद को समेटे हुए,
अपने ही डर से लड़ते हुए,
मैंने खुद ही संभाला था दामन अपना,
सोचा था कि शायद अभी मजबूर हो तुम
इसीलिए मुझसे इतना दूर हो तुम,
सोचा था, शायद सुबह पहर तुम दौड़े
चले आओगे,
क्या क्या बीती मुझपर, ये सुन पाओगे,
लेकिन, तुम नहीं आए, तुम नहीं आए
क्योंकि हर बार की तरह अपनी ही
उलझनों में कहीं गुम होगे शायद,
या शायद, तुम्हें मेरा डर, मेरा विषाद
एक बनावटी नाटक लगा होगा,
नहीं जानती मैं, बस जानती हूँ तो ये
कि उस रात, जब मैं टूट के अकेले कमरे में
यूँ पागलों की तरह भागी थी,
अपने अस्तित्व को खोजने
फिर तुम तक दौड़ लगाई थी,
तुम नहीं थे, कहीं नहीं थे,
रात के उस सन्नाटे को चीर,
वो शुष्क आवाज़ आई थी,
जो कहती थी, तू कहीं नहीं है,
सो जा, कि तेरा अस्तित्व ही नहीं है,
जो ये बात समझी है, तो संभल जा
संभल जा, कि साँसों की डोर थमी नहीं है
लेकिन, मैं सम्भाल नहीं पाई खुद को,
उस शुष्क आवाज़ ने जैसे,
मुझे तुमसे रुबरु कराया था
क्या है इस रिश्ते का सच वो सामने आया था,
बहुत डांटा, बहुत समझाया
ना हुआ तो उस अनजान ने
मरने का डर भी दिखाया,
मैं फिर भी नहीं संभल पाई,
जानते हो क्यों?
क्योंकि उम्मीद लगाए बैठी थी मैं,
जो उन कुछ घंटों में टूट गई,
तुम आए, अफसोस के देर कर दी,
क्योंकि अब, मैं संभल गई

~नन्दिनी

मेरी कविता, मेरी आवाज़..
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2 Comments

    1. शुक्रिया

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