मैं तैनूं फेर मिलांगी…..

Nandini/ June 24, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

प्यार में डूबे हर दिल ने कभी ना कभी अपने प्रेम को छोड़कर कहीं दूर जाते हुए तसल्ली के ये चार लफ्ज़ ज़रूर कहे होंगे। और कहें भी क्यों ना, किसे भाता है अपने प्यार से दूर जाना ? कौन चाहता है कि वो उस एक व्यक्ति से जुदा हो जाए, जिससे वो शायद दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता है ? लेकिन फिर, ये भी तो सच है ना, कि हर इंसान हर पल, हर वादा नहीं निभा सकता। मजबूरियां होतीं हैं कुछ इस समाज के बंधनों की, तो कुछ दिल की। कहां हो पाता है कि कोई किसी एक के लिए अपना सबकुछ छोड़ दे, कहाँ कोई किसी को अपनाने के लिए आता है। प्यार अगर दवा है, तो दर्द भी है, प्यार की, ज्ञान की बातें तो बहुतों को करते देखा है, प्यार ऐसे नहीं वैसे होता है, इसमें ये नहीं वो होता है और भी ना जाने क्या क्या। लेकिन एक बार पूछ कर देखिए ज़रा, अच्छे अच्छे पढ़े लिखे आशिक़ इन गलियों में आवारा बन फिरते हैं और फिर यहीं दम तोड़ देते हैं। ये प्यार जो ज़ख्म देता है, वो नासूर बन ज़िन्दगी भर हमारे साथ रहता है। ऊपरी घाव की मरहम पट्टी तो आसानी है, उस घाव का क्या, जो किसी झूठी तसल्ली का गवाह बन हर पल जलता रहता है।

कितने सरल से शब्दों में अमृता जी ने हर बिछड़ते हुए दिल की बात कह दी है, कहां पता होता है किसी को कि अब वो कब, कहाँ और कैसे मिलेंगे, बस एक आस होती है, और ज़िन्दगी उसी के सहारे कट जाती है। अमृता जी जानती थीं, कि सच्ची मोहब्बत के ज़माने कभी नहीं जाते, और मोहब्बत किसी ज़िद्दी बच्चे की तरह हर पल इंतज़ार कर सकती है।

खैर, अमृता प्रीतम जी कि लिखी ये कविता जो कि उन्होंने इमरोज़ के लिए लिखी थी, आज भी प्यार करने वालों के दिल में किसी खंजर सी चुभती आस लगती है। वो आस के जिसमें आज भी मैं बैठी उसका इंतज़ार करती हूँ, वो आस के जिसमें आज भी वो वादा छलकता है, के अबकी आऊँगा, तो साथ ले जाऊँगा। वो आएगा या नहीं मैं नहीं जानती, लेकिन मैंने एक वादा किया है, कि वो जब भी आएगा, मैं यहीं मिलूंगी, किस तरह, किस रूप में पता नहीं, लेकिन मैं सदा इंतज़ार करूँगी।

मेरी पसंदीदा कविता, इसका हिंदी संस्करण भी साथ ही में प्रकाशित है।

~नन्दिनी

मैं तैनू फ़िर मिलांगी
कित्थे ? किस तरह पता नई
शायद तेरे ताखियल दी चिंगारी बण के
तेरे केनवास ते उतरांगी
जा खोरे तेरे केनवास दे उत्ते
इक रह्स्म्यी लकीर बण के
खामोश तैनू तक्दी रवांगी

जा खोरे सूरज दी लौ बण के
तेरे रंगा विच घुलांगी
जा रंगा दिया बाहवां विच बैठ के
तेरे केनवास नु वलांगी
पता नही किस तरह कित्थे
पर तेनु जरुर मिलांगी
जा खोरे इक चश्मा बनी होवांगी
ते जिवें झर्नियाँ दा पानी उड्दा
मैं पानी दियां बूंदा
तेरे पिंडे ते मलांगी
ते इक ठंडक जेहि बण के
तेरी छाती दे नाल लगांगी
मैं होर कुच्छ नही जानदी
पर इणा जानदी हां
कि वक्त जो वी करेगा
एक जनम मेरे नाल तुरेगा
एह जिस्म मुक्दा है
ता सब कुछ मूक जांदा हैं
पर चेतना दे धागे
कायनती कण हुन्दे ने
मैं ओना कणा नु चुगांगी
ते तेनु फ़िर मिलांगी

***********************

मैं तुझे फ़िर मिलूंगी
कहाँ किस तरह पता नही
शायद तेरी तख्यिल की चिंगारी बन
तेरे केनवास पर उतरुंगी
या तेरे केनवास पर
एक रहस्यमयी लकीर बन
खामोश तुझे देखती रहूंगी
या फ़िर सूरज कि लौ बन कर
तेरे रंगो में घुलती रहूंगी
या रंगो कि बाहों में बैठ कर
तेरे केनवास से लिपट जाउंगी
पता नहीं कहाँ किस तरह
पर तुझे जरुर मिलूंगी

या फ़िर एक चश्मा बनी
जैसे झरने से पानी उड़ता है
मैं पानी की बूंदें
तेरे बदन पर मलूंगीऔर एक ठंडक सी बन कर
तेरे सीने से लगूंगी

मैं और कुछ नही जानती
पर इतना जानती हूँ
कि वक्त जी भी करेगा
यह जनम मेरे साथ चलेगा
यह जिस्म खतम होता है
तो सब कुछ खत्म हो जाता है

पर चेतना के धागे
कायनात के कण होते हैं
मैं उन कणों को चुनुंगी
मैं तुझे फ़िर मिलूंगी !!

Share this Post

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*
*