मेरा कोई घर नहीं

Nandini/ June 20, 2020/ Social Issues/ 0 comments

कुछ दिनों से एक बात दिल को चुभ रही है, हर रोज़ ख़ुद से सवाल करती हूँ कि मेरा घर कहाँ है, कौन सा है ? रह रह कर एक ख्याल दिल को अन्दर तक चीर देता है कि मेरा अपना कोई घर नहीं है जहाँ मैं जब चाहूं कुछ पल सुकून के बिता़ सकूँ |

शादी से पहले जिस घर में इतराती फिरती थी, वो तो अब मायका हो चला, और शादी करके आयी तो ससुराल मिला | लोगों ने कहा कि यही रीत है, लड़की पहले माता पिता और फिर पति के घर में रहती है| जन्म और मरण कहाँ होगा ये तो किसी के बस में नहीं होता, पर हमें तो कहाँ जीना है, ये भी सोचने का अधिकार नहीं मिलता | बचपन से सिखाया जाता है कि बेटा (ये बेटा सिर्फ़ नाम के लिए बोला जाता है) ये तुम्हारा अपना घर है इसे सजाओ- संवारो, अच्छे से रखो आगे काम आएगा, लेकिन, कहाँ काम आयेगा ये तब पता चलता है जब हम एक घर संभालने लायक हो जाते हैं | फिर एक अच्छा सा खानदान और लड़का देख कर हमें विदा कर दिया जाता है, विदा करते वक्त माँ वही सीख फिर से देती है, कि वो घर अब तुम्हारा है, अच्छे से सजा संवार कर रखना | मैंने पूछा कि अगर वो घर मेरा है तो जहाँ अब तक थी ये किसका था, माँ ने कहा कि अब तुम्हारे दो घर हो गए हैं|

मैं बहुत खुश कि अब मैं कभी भी, कहीं भी अकेली नहीं हूँ, अब मेरे दो घर हैं | लेकिन पता नही कब वो घर जो मेरा था, वो मायका बन गया, और ये घर जिसे अपना समझा था, ये ससुराल बन के रह गया | मेरा अपना तो कुछ है ही नहीं, माँ के घर जाना हो तो पहले ससुराल से इजाज़त लेनी होती है, और माँ के घर पहुंचो तो पहला सवाल जो पूछा जाता है कि, कितने दिनों के लिए आयी हो? जिस घर में बचपन बीता वो अचानक पराया हो जाता है और जिसे अपना बनाने कि कोशिश करते उम्र निकल जाती है उसकी दीवारें भी अपनी सी नहीं लगती | आज समझ आता है उनका दर्द जिनके घर नहीं होते, उनकी आँखें क्यों हर पल भर जाती हैं, उनक़ी आँखों का सूनापन आज मेहसूस कर पाती हूँ |

पता नहीं मैं इस घर को नहीं अपना पा रही हूँ या ये घर मुझे ख़ुद से दूर धकेल रहा है, कमी शायद मुझमें ही हो, क्योंकि सदियों से जो परम्परा चली आ रही है, वो तो यही कहती हैं कि पति का घर ही पत्नी का घर होता है | पत्नी का वजूद भी पति से है और उसका मान सम्मान भी उसी से है | अगर ये सच है तो क्यों मेरा मन रोज़ उस घर को क्यों ढूँढता है, जहाँ जाने पर कोई मुझसे ये ना पूछे कि वापस कब जाना है ? जहाँ कि दीवारें मेरे वजूद को, और मुझे वैसे ही अपनाएँ जैसी मैं हूँ , जहाँ जाने पर मुझे वो प्यार मिले जिस पर शायद मेरा अधिकार है | शायद जीने का हक मिल जाए, एक घर ढूँढ रही हूँ मैं जो मेरा हो, जहाँ सुकून, शांति और विश्वास हो | जहाँ जाओ तो मन करे कि बस यही है वो जगह जहाँ मैं सुकून से अपने जीवन के आखरी दिन बिता़ सकूँ | सच तो ये है कि ऐसा कोई घर कहीं है ही नहीं, मेरा कोई घर नहीं है, अगर है तो बस मायका और ससुराल |

तलाश है मुझे मेरे घर की, शायद कभी, शायद कहीं उम्र की सांझ में मिल जाए |

IMG Courtesy: goodfon.com

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