परमात्मा…

Nandini/ June 28, 2020/ Social Issues, कविता/Poetry/ 0 comments

कभी कभी ये सवाल मन में आता है,
जाने क्यों हमारे गुरुओं को नहीं सताता है!

ये नारी को सती किसने बनाया होगा,
क्या देवता ने भी कभी ये पुण्य कमाया होगा।
जगत के कल्याण हेतु, तुम हर रूप में आए थे,
जिस नारी ने तुमको पूजा, जिस नारी ने तुमको चाहा
अपनाकर पत्नी रूप में उसको, तुमने अपना फ़र्ज़ निभाया

वो बैठी बैकुंठ में, तुम्हारे हर कृत्य को देखती रहती थी
मेरा पति बस मेरा नहीं, ये सोच के भी खुश रहती थी,
क्या होता अगर किसी ने उसको, पत्नी रूप में चाहा होता
क्या तुमने उसके सतीत्व पर, प्रश्न नहीं उठाया होता ?

वृंदा का यूँ छल कर मान, उसको कर्म का नाम दिया
फिर क्यों रावण के छल को तुमने, सीता का अपमान कहा
शूर्पणखा ने चाहा तुमको, क्यों उसको अपमान मिला
क्यों राधा से प्रेम रचाकर, रुक्मणि को सम्मान मिला।

जब देवी ने भी तुम संग सारे, अवतारों में जन्म लिया,
हर बार तुम्हारी भार्या बन कर, सतीत्व का निर्वाह किया,
फिर, क्यों नारी को दोषी कह कर, हर बार सज़ा दी जाती है
विवाह रूपी बेल में क्यों, बस नारी ही जकड़ी जाती है

तुम कहोगे, तुमने उसे, देवी को सर्वोच्च स्थान दिया,
लेकिन इसके बदले तुमने, उससे ही बलिदान लिया,
कब उसने शक्ति मांगी थी, कब मांगा था उसने आसन,
कभी प्रेम, कभी त्याग के नाम, छला गया था उसका मन,

तुम ईश्वर, पालनकर्ता हो, पर एक बात सिखाना भूल गए,
रूप धरा जो नारी का, हर कष्ट उठाना पड़ता है, लेकिन
पालनकर्ता को भी अपना, पुरुषत्व निभाना पड़ता है।

~नन्दिनी पी

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