प्यार दोनों ने किया था गर

Nandini/ June 23, 2020/ Love, कविता/Poetry/ 3 comments

प्यार दोनों ने किया था गर
सज़ा फिर क्यों, बस मुझे मिली
साथ चलने का वादा दोनों का था,
महफ़िल बस क्यों तुझे मिली
मैं स्याह रात सी काली,
तुम जुगनू बन चमकते रहे
मैं पत्त्ते पर पड़ी बूंद ओस की,
तुम सूरज बन दमकते रहे
मैं जाड़े की अलसाई धूप,
तुम जेठ की तरह अड़े रहे
मैं सावन की रिमझिम फुहार,
तुम तूफानों सा रुख लिए रहे
मैं बासन्ती रंगों में रंगी
तुम हर रंग खुद में समेटे रहे
मैं पल पल बातें करती रहती,
तुम खमोशी से खड़े रहे,
मैं गुलज़ार की एक नज़्म पुरानी
तुम गीता का श्लोक रटते रहे
मैं, तुमसे शुरू तुम्हीं पर खत्म
तुम, औरों के गले लगते रहे,
मैं, तुम्हें खो देने का डर समेट
एक कोने में खड़ी रही,
तुम, अलमस्त , बेफिक्री से
अपनी चाल चलते रहे,
मैं, नदिया बन हर क्षण को
तुममें समाती रही,
तुम, सागर सा अस्तित्व लिए,
मुझे खारा करते रहे
तुम, के जाने कौन दिशा से आए थे,
कौन दिशा को जाना है
मैं, तुम्हारी मुहब्बत सजा कर,
अपनी दिशा तजती रही,
प्यार दोनों ने किया था गर,
सज़ा फिर क्यों बस मुझे मिली
रुस्वाईयों के आंगन में,
मूरत बन मैं ही खड़ी रही।

~ नन्दिनी

Img Courtesy – myrepublica.nagariknetwork.com

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3 Comments

  1. शिकायतों का पिटारा और दर्द👌👌

    1. जी शिकायतों का पिटारा नहीं, लेकिन दर्द बेहिसाब है, शायद इसीलिए ये प्यार है।

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