प्यार, उम्र और समाज..

Nandini/ June 20, 2020/ Love, Social Issues/ 0 comments

देखो तो ज़रा, ना उम्र का लिहाज़ किया ना  जवान बच्चों का , भला ये  भी कोई उम्र है दूसरी शादी की ? भई हमने तो इस उम्र में माँ–बाप को बच्चों की शादी के लिए दौड़ते भागते देखा है ,यहाँ तो रीत ही पलट दी इन लोगों ने , माँ–बाप मंडप में बैठे हैं और बच्चे अतिथि स्वागत में हाहाहा.

कुछ सज्जन महिलाओं की अट्टहास से पंडाल गूँज उठा | इसके पहले कि लोग समझ पाते , वो सभ्य एवं सज्जन महिलाएं फिर कानाफूसी में व्यस्त हो गईं | अरे  मैंने तो ये भी सुना है कि दोनों का चक्कर कई सालों से चल रहा था , वो तो बच्चों को पता चला तो उन्होंने बेईज्ज़ती के डर से दोनों की शादी कराने का फैसला लिया, वरना दोनों इसी तरह बेशर्मी फैलाते रहते| दूर खड़े होकर ये सब सुनते- सुनते जब मिसेज शर्मा (जो कि अब मिसेज खन्ना बन चुकीं थीं) कि बेटी श्रुति थक गई और उससे रहा नहीं गया तो उसने इन सब बातों को हमेशा के लिए ख़त्म करने का फैसला लिया और माइक को अपने हाथ में लिया |

“आप सबका बहुत- बहुत धन्यवाद जो आज  हमारी खुशियों का हिस्सा बने  , पापा का तो याद नहीं , लेकिन माँ ने हमेशा हमें दोनों का प्यार दिया है,  हर मोड़ पर हमारी शक्ति बन हमारे साथ खड़ी रहीं, आँखें हमारी नम होतीं और आंसू उनके निकलते, धूप हो या बरसात, उनका साया हमेशा हम पर बना रहा| हमें लगता था कि हम उनकी पूरी दुनिया हैं , जैसे वो हमारी, फिर एक दिन अचानक हमें खन्ना अंकल के बारे में पता चला, यकीन मानिए हमें बड़ा गुस्सा आया ये बात जानकर” ये सुनते ही उन सज्जन महिलाओं ने एक दूसरे को एक व्यंग्यात्मक मुस्कान  दी |

“हमें  यकीन  ही नहीं हो रहा था कि हमारी माँ हमसे ज़्यादा किसी और से भी प्यार कर सकतीं हैं , हम माँ से बिना कुछ पूछे, उन पर बरस पड़े, आप ऐसे कैसे किसी से प्यार कर सकतीं हैं ? अपनी उम्र देखी है ? लोग हमारा कितना मज़ाक बनायेंगे और भी न जाने क्या-क्या नहीं कह दिया था हमने गुस्से और नाराज़गी में, और वो हमें एकटक बस देखती रही, ना हमें कोई समझाईश दी, ना कोई सफाई| क्योंकि यही तो सिखाया था उन्होंने हमें ,अपने फैसलों के लिए दूसरों को सफाई तब तक मत दो, जब तक तुम्हें खुद वो गलत न लगें|

उस दिन माँ ने भी हमें कोई सफाई नहीं दी, बस चुपचाप अपने ऊपर लग रहे इलज़ाम सुनती रहीं | ” अब पंडाल में शान्ति थी, जो जहाँ खड़ा था, वहीं खड़ा रहा|

” कुछ दिनों बाद मुझे प्यार हुआ, एक अजीब सी हलचल, खुशी, बैचैनी से मन भर उठा था , धीरे-धीरे मैं हर उस इंसान से दूर होती जा रही थी जो कभी मेरी ज़िंदगी हुआ करते थे, अपनी माँ से भी | ऐसा लगता था कि बस ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफा मुझे मिल चूका है, अब किसी और कि ज़रुरत ही नहीं है, सब कुछ तो है मेरे पास, अच्छी नौकरी, घर, पैसे, और अब इन सबसे बढ़कर एक साथ, एक एहसास जो ज़िंदगी को ज़िंदगी जीना सिखाता है, मैं खुश थी, अपनी ही दुनिया में गुम| एक दिन मैंने माँ को ये बात बताई, वो बहुत खुश हुईं, उनकी आँखों में आँसू थे , जो ख़ुशी के थे | वो खुश थीं कि उनकी बेटी उस खुशनुमा एहसास से गुज़र रही है , जिसने उनकी वीरान ज़िन्दगी में भी कभी खुशियाँ भरीं थीं |”

श्रुति कि ज़बान अब लड़खड़ाने लगी थी, ये देख तन्मय जो उसका होने वाला पति था , उसके साथ आ कर खड़ा हो गया, अब माइक उसके हाथ में था |

“एक दिन मुझे श्रुति ने मम्मी और खन्ना अंकल के बारे में बताया, और ये भी कि किस तरह उसने अपनी ही माँ कि इस ज़रुरत को नज़रंदाज़ कर दिया , हमने उसी दिन फैसला लिया कि हमारी शादी से पहले हम माँ और खन्ना अंकल की शादी करवाएंगे, सिर्फ इसीलिए नहीं कि इस उम्र में एक सहारे की ज़रुरत होती है, क्योंकि ये ज़रुरत तो उम्र के हर मोड़ पर होती है और सहारा देने वाले तो हर मोड़ पर खड़े मिल ही जाते हैं| आपमें से ही ऐसे कितने जोड़े होंगे जो एक दूसरे का सहारा तो हैं , लेकिन साथ हैं या नहीं ये आप ही बेहतर जानते हैं|”

अब पंडाल में हर आँख अपने सहारे में साथ ढूँढने में लगी थी, तन्मय ने कहना ज़ारी रखा |

“माँ और खन्ना अंकल एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं ये तो हम जानते थे, लेकिन उनके प्यार कि गहराई उस दिन पता चली जब हमने उनके सामने शादी कि बात की और बिन बोले ही उनकी आंखों ने हमें उस सच का अनुभव करा दिया जो हमने आज तक महसूस नहीं किया था, प्यार बस दो जिस्मों का नहीं दो आत्माओं का मिलन होता है , उनकी आखों ने हमें एहसास कराया कि किसी से प्यार का इज़हार करना और उसके साथ को हर पल महसूस करना दोनों में कितना फर्क होता है | हम अक्सर प्यार को उम्र और समाज के दायरे में कैद कर देते हैं, लेकिन सच तो ये है कि ये किसी भी उम्र और हालात में हो सकता है, हाँ ये सच है कि प्यार सबकुछ नहीं होता, लेकिन आप ही सोचिए कि अगर ये प्यार नहीं होता तो हम और आप कहाँ होते | माँ – बाप बच्चों को बड़ा करते हैं, उन्हें इस दुनिया में रहने का सलीका सिखाते हैं और फिर जब वो उनके विचारों के विपरीत कुछ करता है तो अपने प्यार, बलिदान कि दुहाई देते हैं, तो क्या ये प्यार है ? ” सब खामोश थे , कुछ आखें भी नम थीं |

अब माइक श्रुति के हाथ में था “अक्सर पति पत्नी एक दूसरे के लिए किए गए कामों को फ़र्ज़ का नाम देकर एक दूसरे को चुप करा देते हैं, क्या ये प्यार है ? माँ और पापा (खन्ना जी को श्रुति ने पहली बार पापा बोल कर बुलाया था ) ने हमें सिखाया कि प्यार निभाने के लिए साथ रहना नहीं , साथ होना ज़रूरी होता है , वो दूर रहकर भी एक दूसरे के साथ खड़े थे हमेशा, एक दूसरे कि हर कही अनकही समझ जाते थे, चाहते तो कब के शादी करके इस रिश्ते को नाम दे देते , लेकिन नहीं उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का एहसास था, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया, अब हमारी बारी थी, हमें भी तो उन्हें खुशियाँ देनीं थीं, जिन्होंने हमारी ज़िन्दगी में रंग बिखेरे थे , इसीलिए हमने इन्हें सामाजिक रूप से भी एक करने का फैसला लिया| सामाजिक रूप से इसीलिए कहा , क्योंकि आत्मा तो दोनों की ना जाने कब से मिल चुकीं हैं |सच्चा प्यार क्या होता है ये तो मुझे नहीं पता, हाँ लेकिन इतना ज़रूर समझ आया कि प्यार को किसी सीमा में परिभाषित नहीं किया जा सकता| “

अब सभी सज्जन महिलाएं चुप थीं , शब्द नहीं मिल रहे थे या सोच बदल गई थी , ये तो ऐसी किसी अगली शादी में ही पता चलेगा |

Img Courtesy : cheap-library.com

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