मैंने कब ये सोचा था!

Nandini/ June 23, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

मैंने कब ये सोचा था एक ऐसा दिन भी आ जाएगादीवानों की जैसे मैं छज्जे पे रात गुज़ारूँगी,जब चांद बादल की ओट में, लुका छिपी खेलेगामैं छत पर लेटे लेटे, तारों को यूँ निहारूँगी।मैंने कब ये सोचा था..मैं, के इन पेड़ों के साए से भी डर जाती थी,आज उसी को ताक ताक आंखों में रैन उतारूंगीमैंने कब ये सोचा था..चारों

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