हुनर

Nandini/ June 26, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

मुझमें ये हुनर है, कि मुझमें कोई हुनर नहींजीवन को जीने का जज़्बा तो है,पर कैसे जीना है, ये पता नहीं मैं गल्तियों को अपनी स्वीकारती हूँ,तुम किसी काम की नहीं, ये बोले कोई,उससे पहले ही ये सच जानती हूँ,मैं जानती हूँ, कि कोई मेरी ओरखींचा चला आए,मेरे अंदर ऐसी कोई बात नहीं, ना पाक कला में निपुण हूँ,ना घर

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