चालीसवां साल

Nandini/ July 3, 2020/ Social Issues, कविता/Poetry/ 0 comments

कल ही कि तो बात लगती है, जब मैं बाबा के आंगन में खेला करती थी, जब माँ के हाथ से हर ग्रास का, सुख चखा करती थी, जब पहली बार स्कूल गई थी, पहली सहेली बनी थी, पहला वो टिफिन का डब्बा, पहला वो नया नया बस्ता, पहली कट्टी,पहली बट्टी,पहली डांट,पहला पाठ सब लगता है जैसे कल ही की

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