चालीसवां साल

Nandini/ July 3, 2020/ Social Issues, कविता/Poetry/ 0 comments

कल ही कि तो बात लगती है, जब मैं बाबा के आंगन में खेला करती थी, जब माँ के हाथ से हर ग्रास का, सुख चखा करती थी, जब पहली बार स्कूल गई थी, पहली सहेली बनी थी, पहला वो टिफिन का डब्बा, पहला वो नया नया बस्ता, पहली कट्टी,पहली बट्टी,पहली डांट,पहला पाठ सब लगता है जैसे कल ही की

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परमात्मा…

Nandini/ June 28, 2020/ Social Issues, कविता/Poetry/ 0 comments

कभी कभी ये सवाल मन में आता है,जाने क्यों हमारे गुरुओं को नहीं सताता है! ये नारी को सती किसने बनाया होगा,क्या देवता ने भी कभी ये पुण्य कमाया होगा।जगत के कल्याण हेतु, तुम हर रूप में आए थे,जिस नारी ने तुमको पूजा, जिस नारी ने तुमको चाहाअपनाकर पत्नी रूप में उसको, तुमने अपना फ़र्ज़ निभाया वो बैठी बैकुंठ में,

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मेरा कोई घर नहीं

Nandini/ June 20, 2020/ Social Issues/ 0 comments

कुछ दिनों से एक बात दिल को चुभ रही है, हर रोज़ ख़ुद से सवाल करती हूँ कि मेरा घर कहाँ है, कौन सा है ? रह रह कर एक ख्याल दिल को अन्दर तक चीर देता है कि मेरा अपना कोई घर नहीं है जहाँ मैं जब चाहूं कुछ पल सुकून के बिता़ सकूँ | शादी से पहले जिस

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