तुम्हारा वजूद और मैं…

Nandini/ June 24, 2020/ कविता/Poetry/ 3 comments

क्या है जो तुम्हें मुझसे जुड़ने नहीं देता
क्या है जो मेरे दिल को उड़ने नहीं देता
मैं तुम्हारे वजूद में कहीं नज़र नहीं आती
मैं तुम्हारे रोज़ के किस्सों में नहीं छाती
ना तुम्हारे किसी ख्वाब का हिस्सा हूँ
हां तुम्हारी हसीं रात का भूला हुआ सा किस्सा हूँ
तेरा नहीं आना तो अब ज़ाहिर सी बात है
तेरी इंतजारी में ना गुज़रे, कहां ऐसी रात है
ना सोचा था कभी, कि यूँ भी गुजरेंगे दिन
जहाँ रह जाएंगे बस, मेरे खयाल, तेरे बिन
तेरे बिन जीना नहीं, ये कसमें हमने थीं खाईं
देख ज़रा कैसे, हमने अपनी ही बातें बिसराईं
वो कौन से दर है, जहाँ मन्नत के धागे थे बांधे
आज जब ढूंढती हूँ, तो रूठे हैं सब दरवाज़े
मेरे लिबास, मेरी हंसी पर मत जा हमनवा मेरे
मुझे रुआंसा देख जल उठेगी रूह तेरी,
इसीलिए ये चोला ओढ़ रखा है,
वरना सफेद चादर से, कोई पुराना सा रिश्ता है ।

~नन्दिनी

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3 Comments

    1. शुक्रिया

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