यूँही कह दिया था तुमने

Nandini/ June 24, 2020/ कविता/Poetry/ 0 comments

यूँही कह दिया था तुमने इस बार मिलेंगे हम
खोखले दिल में अरमानों का, इक रंग भरेंगे हम

ना जाने कितनी बातें, हर रोज़ मैं खुद से करती
अपने दिल के सारे राज़, तुम्हीं से साँझा करती

सोचा था, उस मंदिर ले जाउंगी तुम्हें,
स्कूल से भाग कर जहाँ, घंटों बैठा करती थी
उन गलियों से गुज़रूँगी तुम्हारे साथ,
जहाँ बचपन की यादों ने घर बना रखा है,
ले जाउंगी तुम्हें नर्मदा के उस पार,
जहाँ  मैंने अपने अरमानो को संजोए रखा है

बैठ नदी किनारे, तुमसे मन की सारी बातें कह डालूंगी
जो अधूरा सा रह गया है हमारे बीच, वो पूरा कर डालूंगी

मई का सूरज, जब आँखों को सताएगा,
तुम्हारे काँधे पर, रखकर सर छुप जाउंगी
तुम्हारी उंगलियां जब बालों को सहलाएंगी,
मैं छुईमुई सी कहीं, तुममें ही समा जाउंगी

कुछ गीला सा महसूस करो गर काँधा, घबराना नहीं,
खुशी आँखों में समा जाए, ये मुमकिन तो नहीं

तुम बारिश कि तरह बरसना मुझपर, मैं मिट्टी बन महक जाऊँगी,
तुम हवा की तरह बहना सरसर, मैं रेत बन, उड़ जाउंगी

ताकती रही हर राह , जो इस शहर को आती है
देखती रही हर सड़क, जो तुम्हें मुझ तक पहुंचाती है

ना जाने कितने ही अरमान सजाये इन सूनी आँखों पर
तुम्हें ढूँढा मैंने हर गली, हर चौबारे पर

तुम दिखे तो नहीं, बस खबर आई,
की बहुत दूर हो तुम,
आना तो था, मगर, मजबूर हो तुम

यूँही कहे वो शब्द आज भी टीस बन के चुभते हैं मन में,
की इस साल मिलेंगे हम, कहीं मेरे शहर में

~नन्दिनी

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